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'' अपने ही घर में बेगानी हिन्दी ''

Posted On: 29 Sep, 2015 Others में

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हिंदी विश्व की तीसरी प्रमुख भाषा है , लेकिन यह अत्यधिक चिंतनीय बात है कि विश्व व्यापार जगत में हिंदी का कहीं स्थान ही नहीं है | 14 सितंबर को देश में हिंदी दिवस मनाया जाता है , यह जानकर ही मन प्रफुल्लित हो जाता है कि यह हिंदी दिवस हमारी राष्ट्र भाषा का उत्सव है | पर एक दुर्भाग्य ही है कि देश भर के किसी बड़े टीवी चैनल पर हिंदी भाषा और साहित्य की कोई चर्चा नहीं होती | भला हो दूरदर्शन का जो हिंदी का भार और साहित्यिक गतिविधियों का संचालन समय-समय पर करते आ रहा है नहीं तो हिंदी दिवस पर भी सन्नाटा ही पसरा होता | हिंदी पखवाड़ा मनाने का निर्देश हर वर्ष देश की राजभाषा की तरफ से जारी किया जाता है और सभी वरिष्ठ अधिकारियों से अनुरोध किया जाता है कि वे कम से कम इस पखवाड़े के दौरान हिंदी में हस्ताक्षर ही कर ले , क्योंकि हिंदी में कार्य निष्पादन तो भारत सरकार के लिए असंभव सा है | हिंदी भाषी राज्यों में तो करीब करीब सारे कार्य राजभाषा में ही किया जाता है क्योंकि राजभाषा ‘ओफशियल लैंगवेज़’ है भाषा संवाद का माध्यम है , भाषा की सहजता उसके प्रचलन,प्रसारण में सहायक बनती है | हिंदी के प्रचार प्रसार में भारतीय सिनेमा ने अपना अमूल्य योगदान दिया है नहीं तो दूरदर्शन को छोड़कर हिन्दी का प्रयोग तो कोई भी प्राइवेट चैनल नहीं करता | सोचने वाली बात है कि जिस भाषा मेन मनुष्य पहली बार तुतलाता है उसी भाषा के इस्तेमाल से खुद की तौहीनी समझता है और बड़े ही शान से अँग्रेजी का इस्तेमाल करता है | अभी 14 सितंबर तक देश के सभी कार्यालयों में हिन्दी पखवाड़ा के नाम पर हिंदी की जयघोष सुनाई देगा पर इसके बाद अँग्रेजी की महिमा बदस्तूर जारी रहेगा | हिंदीतर प्रांतों में दस में से करीब आठ लोग हिंदी के विरोध का रोना रोते रहे पर अपने ही घर में हिंदी बेगानी ,घृणित उपेक्षित होती चली गई पर इसका लेशमात्र भी ग्लानि लोगों में नहीं रहता है | अब तो ऐसा प्रतीत होता है कि हिंदी में बात करना गंवारपन और शर्म की बात हो गई है | एक कसक जो सदैव सालती है कि हम अपनी मातृभाषा हिन्दी को अंग्रेजमुक्त देश तो दिए लेकिन अंग्रेजीमुक्त देश नहीं दे पाए | सवाल यह है कि आजादी के समय हिन्दी के भविष्य और भविष्य की हिन्दी को लेकर जो आशाएँ थी, संभावनाएं थी , जो सपने संजोय गए थे वे भारत राष्ट्र की पराजित मानसिकता में धूमिल कैसे हो गए | गौर से देखा जाए तो हिन्दी अब पिछड़े हुए लोगों की भाषा है , इसका कोई भविष्य नहीं दिख रहा | आज कोई भी अभिभावक अपने बच्चों को हिन्दी माध्यम स्कूलों में नहीं पढ़ाना चाहता क्योंकि उन्हें पता है कि हिन्दी भाषी युवा नौकरी पाने में असफल रहेंगे | सवाल यह उठता है कि बिना राष्ट्रभाषा वाला राष्ट्र क्या भविष्य में अपनी कोई पहचान बना पाएगा ……..??? इसे विडंबना ही कहेंगे कि भारत देश में जिसकी मातृभाषा हिन्दी है वहाँ हिन्दी बोलनेवाले को अशिक्षित , गँवार समझा जाता है वही दूसरी तरफ फ्रांस,जर्मनी,चीन,जापान सबकी अपनी भाषा है ,अगर आप कभी उनसे अँग्रेजी में कुछ सवाल भी करेंगे तो उसका जवाब वो अँग्रेजी में न देकर अपनी भाषा में ही देगा | यहाँ तक की चीन जापान तो अपनी भाषा के प्रयोग पर ज़ोर देते हुए विश्व के सिरमौर बने है,क्योंकि उन्हें अपनी भाषा से आगाध प्रेम है | मातृभाषा के ज्ञान के बिना हृदय की पीड़ा का निवारण संभव नहीं है ,मैं ये नहीं कह रही कि हमें दूसरे देशों से ज्ञान अर्जित नहीं करना चाहिए ,परंतु उसका प्रचार मातृभाषा में ही करनी चाहिए | हमें अपनी संस्कृति एवं सभ्यता को बचाकर रखना होगा तभी एक बेहतर राष्ट्र का निर्माण संभव होगा नहीं तो वह दिन दूर नहीं जब भाषा की हीनता भाषाभाषियों की सांस्कृतिक दीनता बन जाएगी …..||

संगीता सिंह ‘ भावना’

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Vinny के द्वारा
August 1, 2016

That’s more than sesibnle! That’s a great post!


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