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' महिलाओं के सशक्तिकरण में गांधी की भूमिका ''

Posted On: 3 Oct, 2015 Others में

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जहां एक ओर देश के लाखों-हजारों गृहणियाँ महंगाई की मार से प्रतिदिन जूझ रही हैं , क्योंकि घर का बजट गृहणी के हाथों में होता है तो जाहीर है महंगाई की सबसे ज्यादा मार वही सहती हैं और सबसे ज्यादा नाजुक हालत तो उन गृहणियों की होती है जो कहीं नौकरी नहीं करती हैं अगर वो नौकरी करना भी चाहें तो उनके पास कोई रास्ता नहीं,कोई मौका नहीं है | वहीं जब हम गांधी के सपनों के भारत में लौटते हैं , जब देश आजादी की लड़ाई लड़ रहा था ,चहुंओर बस आंदोलनो का शोर था उस वक्त देश में एक और मुहिम चल रही थी ,, ‘ महिलाओं की आजादी और सशक्तिकरण की मुहिम ‘……! गांधी जी का सपना था कि देश की हर महिला स्वावलंबी हो इसके लिए उन्होने कई प्रयोग किए , जिसमें चरखे का प्रयोग प्रमुख था | उनके इस प्रयोग से देश की अनगिनत महिलाओं ने चरखे से सूत कातकर आर्थिक रूप से सशक्त हुई | पर आज जहां ब्रांड के कपड़ों का बोलबाला है वैसे में क्या कोई चरखे के सूत का कपड़ा पहन सकता है ॥?
और अगर गरीब तबके के लोग पहनें भी तो क्या चरखे के सूत से इतनी आमदनी है कि घर का खर्च चल सके और कोई महिला स्वावलंबी हो सके …….? गांधी का सपना था हर क्षेत्र में महिलाओं की बराबर की भूमिका , यही कारण था कि वो जब देश में स्वदेशी आंदोलन की मुहिम चला रहे थे तो सबसे ज्यादा महिलाओं ने अपनी सक्रियता दी थी | गांधी ही सबसे पहले युग पुरुष थे जिन्होने महिलाओं की काबिलियत को समझते हुए उनकी आजीविका के बारे में सोचा था ,उन्होने चरखा को सिर्फ आजादी या आंदोलन तक ही सीमित नहीं रखा,बल्कि इसके माध्यम से उन्होने महिलाओं की आजादी उनकी स्वतन्त्रता का भी ख्याल रखा | महिलाएं जब चरखा चलाती , सूत कातती तो वे आपस में गीत गाते हुये एक दूसरे का मनोरंजन करती जिससे बहुत हद तक वो तनाव मुक्त रहती थी | सीधी बात तो यह है कि जहां मध्यम वर्ग की महिलाओं के लिए यह चरखा आय का साधन बना, वहीं निचले तबके के लिए यह रोजी-रोटी की जुगाड़ का साधन बना | गांधी जी ने महिलाओं को सशक्त बनाकर देश को एक संदेश दिया कि महिलाएं किसी से कम नहीं हैं | गांधी ने चरखा मुहिम चलाकर महिलाओं के जीवन की काया पलट कर दी ,, सबसे गौरतलब बात तो यह है कि उन्होने यह क्रांति तब लाई जब महिलाएं परदे में थी , उनका घर की देहरी से निकलना एक कड़ी चुनौती थी | शायद गांधी ने आधी आबादी की इसी समस्या को देखते हुये चरखे के जरिये यह स्वरोजगार की मुहिम चलाई थी | महिलाओं के लिए यह रोजगार एक तरह से मनोरंजन का भी साधन था क्योंकि गाँव की महिलाएं जब घरेलू कामों से फुर्सत पाती तो आस-पड़ोस की सारी महिलाएं एक जगह इकट्ठा होती और समूह में एक साथ मिलकर बोलते बतियाते इस काम को बड़े ही सहज और उन्मुक्त भाव से यह काम करती ,जिसका सबसे अच्छा असर उनके स्वास्थ्य , पर तथा पारिवारिक माहौल पर पड़ता था | आज तो हालत यह है कि अगर घर की गृहणी बाहर काम पर जाती है तो इसका सबसे ज्यादा असर उसके स्वास्थ्य पर तथा पारिवारिक माहौल पर पड़ता है | वह कुंठा ग्रस्त रहती है ,उसकी गृहस्थी बिखरी रहती है और ऐसे में ऊसका मानसिक संतुलन भी खराब हो जाता है | आज जमाना बदल गया है, हमारी सोच बदल गई है साथ ही हमारी जरूरतें भी बदल गई हैं | एक समय था जब इसी चरखे ने ब्रिटिश हुकूमत की नींद उड़ा दी थी क्योंकि देश की अनंत महिलाएं चरखे के बल पर आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर ही नहीं बल्कि देश के लोगों को पहनने के लिए कपड़े भी तैयार कर रही थी | सबसे गौरतलब बात तो यह थी कि यह तब हुआ जब अंग्रेज़ भारत की पैदावार कपास को जहाज में लादकर इंग्लैंड ले जाते और इसका सूत काटकर सूती कपड़े तैयार करते , फिर उन कपड़ों को भारत लाते और ऊंचे दामों पर बेचते | मतलब खुद के घर का ही माल खुद को महंगा मिलता ,,इससे निजात का तरीका गांधी जी ने भारतियों से सूत से बनी खद्दर के कपड़े पहनने को प्रेरित किया ,, इसके लिए उन्होने खुद लोगों के बीच जाकर चरखा चलाया और खुद भी अपनी हाथों से काती गई सूत की ही धोती पहनना शुरू कर दिया | इस तरह से स्वदेशी वस्त्रों के प्रयोग से इंग्लैंड से आए वस्त्रों की डिमांड घटने लगा और देश ने ब्रिटिश शासन से आर्थिक स्वतन्त्रता प्राप्त किया |

संगीता सिंह ‘ भावना’
वाराणसी

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