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- ''भीतर का बालक जिन्दा रहे ''

Posted On: 18 Oct, 2016 में

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बच्चा जब जन्म लेता है तो एकदम निर्दोष रहता है ,उसका प्रथम स्पर्श माँ की गोद होता है और वहीँ से उसका व्यक्तित्व बनना शुरू होता है ,और यही वह क्षण होता है -भीतर का बालक …..!
बच्चा जैसे-जैसे बड़ा होता है उसमें जिज्ञासा पनपती है और यहीं से वह सिखने की प्रक्रिया शुरू करता है | इस सिखने की प्रक्रिया में वह हँसता है,अपने अँगुलियों को मुंह में डालता है ,भूख लगने पर रोता है और माँ की खुशबु को पहचानता है | आज का बचपन पहले से अधिक मुखर और होशियार है ,पर आज के बच्चे की दुनियां से मासूमियत,भोलापन,सच्चाई,शरारतें ,अटखेलियाँ मस्तमौलापन सब जैसे गायब सा हो गया है ,जबकि इन्हीं गुणों के समावेश से उनकी दुनियां सुवासित रहती थी | माना दुनियां बदल रही है, पर जितनी से तेजी से बदल रही है यह चिंतनीय मुद्दा है | इस बदलती दुनियां में अगर कोई सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहा है तो वह है -बच्चों का बचपन …! रिश्तों की गर्माहट ठंढी पड़ती जा रही है,नतीजतन उनमें भावनात्मक लगाव पनप ही नहीं पा रहा है | आज रिश्ते भावनाओं से ज्यादा जरूरतों पर टिका हुआ है ,नतीजतन उनकी दुनियां की हसरतें बदल गई हैं ,हर समय वे कुछ ज्यादा हासिल करने की होड़ में खड़े हैं | आज न दादी की कहानियां लुभाती हैं , न ही बड़ों की नसीहत ,आज तो बस एक जूनून हावी है-,नायब गैजेट्स ,जो बिना किसी मेहनत के सारे मुश्किलों को पल में हल कर देता है | आज ऐसे बच्चों की भी अधिकता है जो बालसुलभ चंचलताओं से दूर समय से पहले ही जीवन की झंझावातों से जा भिड़ा है | परिवार बच्चों के जीवन का मूल आधार है पर पश्चिमी सभ्यता के अनुकरण ने भारतीय परिवार की रुपरेखा ही बदलकर रख दिया है | पहले परिवार का मतलब कई लोगों का एक साथ रहना और उनके बिच सौहार्दपूर्ण माहौल के बिच एक भावनात्मक जुडाव का होना होता था ,जिसके क्षत्रछाया में पलकर बच्चों का सर्वांगीन विकास होता था,और बच्चों के बचपन को खिलने का का एक स्वस्थ फुलवारी मिलती थी | दादा-दादी,नाना-नानी बच्चो के लिए बौद्धिक संग्रहालय होते थे जिनके जरिये उनमें जीवन-दर्शन ,संस्कारों और मूल्यों का प्रवाह करते थे ,जिससे समग्र रूप में बचपन पल्लवित-कुसुमित होता था और एक बेहतर परिवार का निर्माण करता था | आज न तो माँ-बाप के पास ही फुरसत है कि वह बचपन की इस फुलवारी को संवारे ,और न ही आज अपार्टमेंट के युग में दादा-दादी के लिए ही जगह बचा है जो की बच्चों का मार्ग प्रशस्त का सके | बालमन कोरा होता है,उसपर किसी भी नकारात्मक परिवेश का इतना बुरा असर पड़ता है कि उसकी भरपाई बहुत ही मुश्किल होता है | बच्चे घर में मिले सौहार्दपूर्ण वातावरण से ही सबसे ज्यादा प्रभावित होते है,जिसमें माँ-बाप की विशेष भूमिका होती है | माँ की क्षत्रछाया में बच्चे समर्पण के भाव सीखते हैं और पिता के संरक्षण में परिवार की सत्ता संरचना की छवि विकसित होती है | सहजता बचपन का मूल-मन्त्र है ,यही वह शुद्ध भाव है जिससे होकर पूरे व्यक्तित्व का निर्माण होता है ,पर कभी-कभी माता-पिता अपनी अधूरी इच्छाओं की पूर्ति के लिए अपने बच्चों को जबरन वह सब थोपते हैं जो काम वो खुद न कर सके | पर इसका असर बच्चों के कोमल मन पर बहुत ही गलत प्रभाव डालती है ,और मनोवैज्ञानिक विकास में बाधक बनती है | होना तो यह चाहिए कि बच्चे के स्वस्थ मनोरंजन का विकास करें, ताकि फिर कोई बचपन आभासी कोना न तलाशे और एक भीतर का बच्चा हमेशा-हमेशा जिन्दा रहे |

संगीता सिंह ‘भावना’
सह-संपादक त्रैमासिक पत्रिका ”करुणावती साहित्य धरा’
वाराणसी

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