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'' लिव-इन रिलेशनशिप का बढ़ता बाजार''

Posted On: 25 Nov, 2016 में

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लिव-इन रिलेशनशिप एक बेहद ही जटिल स्वतंत्रता है,भारतीय परिवेश में इसके नकारात्मक पक्ष ही ज्यादा उभरकर सामने आते हैं ,फिर भी यह विवाह का एक बेहतर विकल्प है | तलाक़शुदा स्त्री के लिए लिव- इन एक बेहतर वैकल्पिक व्यवस्था है , हमारे भारतीय समाज में स्त्री का चरित्र बड़ी ही आसानी से उछाला जाता है | ऐसी स्थिति में वह दूसरा कदम बहुत ही डर-डरकर उठाती है ,और इसका सबसे उचित और सुरक्षित तरीका है -लिव -इन ,जहां दोनों पक्षों का आपसी तालमेल न बैठ पाने की स्थिति में आसानी से अलगाव हो जाता है | शादी जैसे स्थायी संबंधों में अब तरह-तरह की दुश्वारियाँ देखने को मिलती हैं ,लोग दांपत्य की दुर्दशा देख विवाह के पचड़े में पड़ने से डरने लगे हैं और ऐसी परिस्थिति में लिव-इन एक बेहतर विकल्प है | स्त्री मन कोमल होता है ,ऐसा सर्वविदित है ,पर आज की परिस्थितियों को देखते हुये यही लगता है कि आज स्त्री अपना स्त्रीत्व बचाकर रख पाने में असमर्थ है | शादी न कर पाने की स्थिति में,तलाक़शुदा ज़िंदगी बिताने की स्थिति में उसपर सैंकड़ों लांछन लगते हैं तथा हर आँख उसे वहशी नजर से देखता है | आज शादी-शुदा ज़िंदगी में अलगाव का अनुपात बहुत बढ़ गया है | आज की इस दांपत्य परेशानी से स्त्री और पुरुष या यों कहें कि पूरा युवा वर्ग ही परेशान है ऐसी परिस्थितियों में लिव-इन का मार्ग चुनना वो बेहतर समझते हैं | पर यहाँ भी परेशानी कम नहीं है,यहाँ भी भावनात्मक परेशानी देखने को मिलती हैं , क्योंकि किसी भी आपसी संबंध की नीव विश्वास , प्रेम एवं भावनात्मक लगाव पर टिकी होती है | भौतिक और आर्थिक संबंध तो क्षणिक हैं और उनका टूटना तय है | आज स्त्रीयां हर मामले में खुद को पुरुषों के काबिल समझ रही हैं और बहुत हद तक उनकी बराबरी भी कर रही हैं और बड़े ही बेखौफ पुरुषों के हर कार्य में भागीदार बन रही हैं | यहाँ तक कि वह अपना रहन-सहन भी पुरुषों की भांति करने लगी हैं , ताकि वह पुरुषों के समानांतर खड़ी हो सके और ऐसा करके उन्हें यह महसूस होता है कि वह पुरुष वर्ग को सबक सीखा रही हैं | स्त्री अपने मूल गुण को भूलकर पुरुषों की बराबरी करने में अपना गौरव समझने लगी है और ऐसा करके वह खुद को पुरुषों की बराबरी का दर्जा देती हैं | आज पूरा विश्व दांपत्य की कमजोर शाख से त्रस्त है और इस समस्या से निजात पाना असंभव सा लगता है | दांपत्य जीवन की कठोरता,दांपत्य की टूटन आज हर घर की कहानी बन गई है,और जितना इस गुत्थी को सुलझाने की कोशिश कि जाए उतनी ही उलझती जा रही है | शादी एक समझौता है जिसमें पति या पत्नी दोनों में से किसी एक को सहनशील होना ही पड़ेगा तभी यह गृहस्थी रूपी पहिया चलायमान होगा | अधिकांशतः स्त्रीयां ही सहन करती हैं ,पर आज हालात थोड़ा पेचीदा हो गया है क्योंकि महिला खुद को पुरुष के बराबरी में समझ रही है | इस वजह से वह सम्झौता करने को कतई तैयार नहीं है,जिस वजह से संबंधों में कड़वापन बरकरार है | पहले स्त्री खुद को पुरुष से कमतर समझती थी इस वजह से सामंजस्य बैठा लेती थी ,पर अब वो बात नहीं है | पहले औरतें अपने पति से पीटती थी तो भी उनके पास वहाँ रहने के सिवा कोई दुरा चारा नहीं था,हाँ स्थिति तब थोड़ी जरूर सुधर जाती थी जब उनके बच्चे बड़े हो जाते थे | पर आज स्त्रीयां आत्मनिर्भर हैं और यही समस्या की मूल जड़ है | आज जब एक लड़की परिणय सूत्र में बंधती है तभी वह मन-ही-मन सारे फैसले कर लेती है कि बनी तो बनी नहीं तो अलगाव के रास्ते तो खुले हैं ही | अब जो सबसे बड़ा परिवर्तन देखने को यह मिल रहा है वो यह है कि लड़कियां हर अनसुलझे सवालों का हल खुद ही खोज रही हैं और अपनी ज़िंदगी आराम से काट रही हैं | आज उन्हें किसी के सहारे की जरूरत नहीं है क्योंकि उन्होने अपना एक अलग मुकाम बनाना सीख लिया है | जहां विवाह एक बंधन है,दायित्व बोध है,सामाजिक सुरक्षा है और बच्चों के स्वस्थ मानसिक विकास के लिए एक बहुत बड़ी जरूरत है वहीं लिव-इन संबंध की नीव आपसी सोच-समझ और प्यार पर टिका है | लिव-इन संबंध में सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं है यह आपसी सूझ-बूझ पर टिका हुआ अस्थायी रिश्ता है जो छोटे से अहं से भी टूटकर बिखर जाता है ,फिर भी लिव-इन का बाजार बड़ी तेजी से बढ़ता जा रहा है |

संगीता सिंह ‘भावना’
सह-संपादिका ”करुणावती साहित्य धारा” त्रैमासिक पत्रिका
वाराणसी

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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Shobha के द्वारा
November 30, 2016

प्रिय संगीता जी आज की बदली समाजिक व्यवस्था के अनुकूल अच्छा लेख मुश्किल तब आती है जब विवाहित पुरुष या स्त्री किसी से लिव-इन-रिलेशन बना लेता है और यदि उसके बच्चे हैं घर टूटता ही है बच्चों पर भी मनोवैज्ञानिक असर पड़ता है आपके लेख उत्तम होते हैं

atul61 के द्वारा
December 3, 2016

संगीता जी विवाह समाज की धुरी है उसे टूटना नहीं चाहिए I यह ठीक है कि पहले दाम्पत्य जीवन को बनाये रखने का भार  महिलाओं ने अपनी ख़ुशी या मजबूरी से उठा रखा था I यदि युवावर्ग अपनी दांपत्य जीवन को बोझ समझेगा तो समाज बिखर जायेगा I अब सामंजस्य  बनाए रखने के लिए युवकों को पुरषोचित अहं छोड़कर सामंजस्य बनाना होगा I सादर अभिवादन सहित अतुल


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